Sunday, November 25, 2018

अयोध्या के मुसलमान गए कहीं नहीं, पर आशंकित ज़रूर हैं

शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के दौरे के बाद विश्व हिंदू परिषद यानी विहिप की रविवार को अयोध्या में धर्मसभा के आयोजन को लेकर भारी सुरक्षा प्रबंध किए गए हैं.

अयोध्या शहर के भीतर प्रवेश करने वाले सभी रास्तों पर पुलिस, पीएसी और आरएएफ़ के जवानों की तैनाती और अधिकारियों की हूटर लगी गाड़ियों की आवाजाही ये बता रही है कि सड़कों के दोनों ओर 'अयोध्या चलो' के नारों के साथ जो पोस्टर्स और होर्डिंग्स लगे हैं, उनका कितना महत्व है.

'जय श्रीराम', 'मंदिर वहीं बनाएंगे', 'हर हिन्दू की यही पुकार-पहले मंदिर फिर सरकार' जैसे नारे यूं तो शनिवार को अयोध्या के लक्ष्मण क़िला मैदान में उद्धव ठाकरे की सभा के दौरान जमकर लग रहे थे, लेकिन ऐसे नारे अयोध्या की फ़िज़ां में पिछले कई दिनों से गूंज रहे हैं. शिवसेना की सभा को संतों के आशीर्वाद लेने के मक़सद से और इसी नाम से शनिवार को आयोजित किया गया था.

महाराष्ट्र के तमाम इलाकों से शिव सैनिक ट्रेन बुक कराकर, गाड़ियों से और बाइक्स से अयोध्या पहुंचे. शिवसैनिक बेहद आक्रामक थे और जोशीले नारे लगा रहे थे.

कड़ी सुरक्षा
अपने नेता उद्धव ठाकरे के एक-एक बयान पर कई-कई नारे लग रहे थे और इन्हीं नारों की ताक़त से उद्धव सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार को मंदिर निर्माण के मुद्दे पर कठघरे में खड़ा कर रहे थे.

उद्धव ठाकरे ने कहा कि कुंभकर्ण की भांति सोई हुई सरकार को जगाने के लिए वो अयोध्या आए हैं. उद्धव ठाकरे रविवार को भी अयोध्या में ही हैं.

रविवार को ही होने वाले विश्व हिन्दू परिष्द के कार्यक्रम धर्म सभा को लेकर उनका कहना था कि मंदिर निर्माण कोई भी करे, शिवसेना का उसको समर्थन रहेगा.

शिवसेना और वीएचपी के कार्यक्रमों को देखते हुए अयोध्या में सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए हैं. स्थानीय पुलिस के अलावा 48 कंपनी पीएसी, आरएएफ़ और एडीजी स्तर के सात अधिकारियों की तैनाती यहां की गई है.

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मुस्लिम टोला का माहौल
लखनऊ ज़ोन के डीआईजी ओंकार सिंह का कहना था कि सभी को आश्वस्त किया गया है कि उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी पुलिस और प्रशासन की है, इसलिए बेफ़िक्र रहें. ओंकार सिंह ने कहा कि स्थानीय लोगों को असुविधा न हो, इसलिए कई रास्तों पर गाड़ियों के आवागमन को प्रतिबंधित भी किया गया है.

बावजूद इसके, अयोध्या के स्थानीय नागरिक ख़ुद को परेशानी में महसूस कर रहे हैं. पांजीटोला, मुगलपुरा जैसे कुछ मोहल्ले की मुस्लिम बस्तियों के लोगों ने बातचीत में आशंका जताई कि बढ़ती भीड़ को लेकर उनमें थोड़ा भय का माहौल है, क्योंकि ऐसी ही स्थितियां 1992 में भी बनीं थीं.

Wednesday, November 7, 2018

एक गांव में 130 साल से बन रहे ग्रीन पटाखे, चीनी सूत्र में छिपी इसकी कहानी

दिवाली पर पटाखों से होने वाले वायु और ध्वनि प्रदूषण को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 23 अक्टूबर को एक याचिका पर सुनवाई करते हुए देश में सिर्फ रात 8 से 10 बजे के बीच ही पटाखे फोड़ने की समयसीमा तय कर दी। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने यह भी आदेश दिया कि अब से देश में सिर्फ ग्रीन पटाखे ही बनाए और बेचे जाएंगे।

ग्रीन पटाखों का गणित समझने की कोशिश में भास्कर को मिले असम के गोपजीत पाठक। जिन्होंने बताया कि वहां के गानाकच्ची गांव में 130 सालों से ऐसे पटाखे बनाए जा रहे हैं, जो सामान्य पटाखों की तुलना में कम धुआं छोड़ते हैं। यहां पर स्थित बारपेटा फैक्ट्री का काम संभाल रहे गोपजीत पाठक ने बताया, ‘‘बाजार में जो पटाखे बिकते हैं, उनमें बेरियम नाइट्रेट और एल्युमीनियम पाउडर का ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है, जिस कारण इनसे ज्यादा धुआं निकलता है और यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इन पर बैन लगाने की बात कही है। वहीं हमारे यहां 130 साल पुराने चीनी तरीके से जो पटाखे बनते हैं, उनमें ज्यादा केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसी वजह से पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम धुआं निकलता है।’’

तोहफे में मिली किताब से मिला था पटाखे बनाने का चीनी सूत्र

पुस्तक से इस पटाखा कंपनी की कहानी शुरू हुई। मेरे दादा का लक्ष्मी नुबी नाम का दोस्त था। लक्ष्मी बांग्लादेश गए थे, बिजनेस के सिलसिले में। वहां से उन्होंने एक पुस्तक खरीदी और मेरे दादाजी को गिफ्ट की। उसमें चीन के पटाखों का फॉर्मूला था। जिसे पढ़कर बांग्लादेश से सामान मंगाया और पटाखा बनाने की फैक्ट्री शुरू की। असम के बरकटा जिले में एक मंदिर था 'नामघर', वहां पर होली का त्योहार बहुत धूमधाम से मनाते हैं। ये सन 1885 के पहले की बात है, उस समय मेरे दादाजी ने लोगों को पटाखे जलाकर दिखाए। इसके बाद ही लोगों ने पटाखे खरीदना शुरू किया और तभी से हमारा कारोबार शुरू हुआ। मेरे दादाजी के गुजरने के बाद पिता ने और फिर मैंने इसका काम संभाला। अभी इस फैक्ट्री को चौथी पीढ़ी संभाल रही है।

जैसा गोपजीत पाठक ने भास्कर को बताया

ग्रीन पटाखे बनाने का तरीका

गोपजीत पाठक ने बताया कि गानाकच्ची गांव में ज्यादा बड़े पटाखे नहीं बनाए जाते। यहां सिर्फ आसमान बुल्ला (एक तरह का रॉकेट), फुलझड़ी और अनार जैसे पटाखे ही बनते हैं। इन्हें बनाने के लिए सल्फेटरी, सल्फर, चारकोल, एल्युमीनियम डास्क और कास्टीरॉन का इस्तेमाल किया जाता है। ये पारंपरिक पटाखों की ही तरह होते हैं। इन्हें बनाने में थोड़ा ज्यादा खर्चा आता है। लेकिन अच्छी बात ये है कि इनसे वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण दोनों ही कम होता है।

इन्हें जलाने से छोटे-छोटे कणों का उत्सर्जन 30-40% तक और सल्फर डायऑक्साइड का उत्सर्जन 50-60% तक कम होता है। पारंपरिक पटाखों की तुलना में ये 25-30% तक कीफायती भी होते हैं।

क्यों ईको फ्रेंडली हैं ग्रीन पटाखे : ऐसे पटाखे  'सेफ वॉटर एंड एयर स्प्रिंकल्स (एसडब्ल्यूएएस) के सिद्धांत पर काम करते हैं। इनमें जैसे ही एल्युमीनियन पानी को अवशोषित करता है, गर्मी पैदा होती है और इसी वजह से पटाखा फटता है और आवाज होती है। यही पानी धूल के कण को फैलने से रोकते हैं। ग्रीन पटाखे जलने के बाद पानी के कण पैदा करते हैं, जिसमें सल्फर और नाइट्रोजन के कण घुल जाते हैं।

Monday, November 5, 2018

हिंदू-मुसलमान नफ़रत की धीमी आंच पर उबलता बिहार BBC EXCLUSIVE

बिहार का सीतामढ़ी शहर. दशहरे की धूमधाम के बाद 20 अक्तूबर को दुर्गा की एक प्रतिमा विसर्जन के लिए ऐसे इलाक़े से ले जाई जाने लगी जहां से उसे जाने की अनुमति नहीं थी क्योंकि प्रशासन उस इलाक़े को संवेदनशील मानता है.

विसर्जन जुलूस पर पथराव की ख़बर आई और फिर प्रतिमा विसर्जन के लिए दूसरे रास्ते से ले जाई गई. लेकिन इसकी सूचना जैसे ही शहर के अन्य हिस्सों में फैली, बड़ी संख्या में लोगों ने उस मुहल्ले पर हमला कर दिया.

दोनों तरफ़ से पथराव हुआ. पुलिस ने मामले में दखल दिया. कर्फ़्यू लगाया गया, इंटरनेट बंद कर दिया गया और पुलिस ने दावा किया कि उसने जल्द ही स्थिति पर नियंत्रण कर लिया.

लेकिन इन सबके बीच लौटती भीड़ ने 80 साल के एक बुजुर्ग ज़ैनुल अंसारी को पीट-पीट कर मार डाला. यही नहीं सबूत मिटाने के लिए लाश को जलाने की कोशिश की गई.

पुलिस को अधजली लाश बरामद हुई. सीतामढ़ी के पुलिस अधीक्षक विकास बर्मन ने बीबीसी को बताया, "इस घटना के बाद असामाजिक तत्वों ने शव को लकड़ी डालकर जलाने की कोशिश की. बाक़ी तो जाँच में पता चलेगा." पुलिस ने इस मामले में 38 लोगों को गिरफ़्तार किया है.

ये है आज का बिहार. क़रीब तीन दशक पहले, 1989 में भागलपुर में सांप्रदायिक हिंसा हुई थी. उस हिंसा में 1100 से ज़्यादा लोग मारे गए थे. लेकिन इसके बाद लंबे समय तक बिहार में इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर सांप्रदायिक हिंसा देखने को नहीं मिली.

क्या बदल गया, कैसे बदल गया?
जब से नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ दूसरी बार गठबंधन करके 2017 में सरकार बनाई है, स्थितियाँ बदल गई हैं. इस साल रामनवमी के आसपास कई ज़िलों में हिंसा हुई थी, इन्हीं में से एक था औरंगाबाद.

इस शहर के नवाडीह इलाक़े में एक संकरा रास्ता नईम मोहम्मद के घर तक जाता है. टूटे-फूटे घर और अस्त-व्यस्त कमरे में बेड पर बैठे नईम मोहम्मद बात करते-करते फूट-फूट कर रो पड़ते हैं. कहते हैं- भीख मांगकर खा रहे हैं और भीख मांगकर इलाज करा रहे हैं. वो कहते हैं कि उनके शहर ने पहले कभी ऐसा नहीं देखा जो इस साल रामनवमी के दौरान हुआ.

भीड़ आक्रामक थी, ग़ुस्से में थी. नारेबाज़ी कर रही थी, हाथों में तलवारें थी और आंखों में नफ़रत. प्राइवेट एम्बुलेंस चलाने वाले नईम मोहम्मद जब खाने के लिए घर जा रहे थे तो एक गोली आकर उन्हें लगी.

ठीक-ठाक ज़िंदगी बसर करने वाले नईम मोहम्मद अब चल-फिर नहीं पाते. वो पूछते हैं- "हमारी क्या ग़लती थी. गोली हमें ही क्यों लगी. हमारा परिवार कैसे चलेगा. हमारी ज़िंदगी कैसे कटेगी".

इस साल रामनवमी के आसपास बिहार के कई ज़िलों में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएँ हुईं. उस बात को सात महीने हो चुके हैं. औरंगाबाद के अलावा नवादा, भागलपुर, मुंगेर, सिवान, रोसड़ा और गया जैसे कई शहरों में हिंसा हुई.

दुकानें लूटी गईं. दुकानें जलाई गईं, इनमें से ज़्यादातर दुकानें मुसलमानों की थीं. नारेबाज़ी हुई, पाकिस्तान जाने के नारे लगे, टोपी उतारने के नारे लगे, वंदे मातरम और जय श्रीराम के नारे लगे, मुस्लिम इलाक़ों में हिंदुओं के धार्मिक जुलूस पर पथराव भी हुए.

बिहार में पहली बार ऐसा हुआ, जब एक साथ इतने ज़िले सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में आए.

बिहार के औरंगाबाद में ईदगाह की ज़मीन पर बजरंग दल का झंडा लगा दिया गया. जुलूस को उस ओर मोड़ने की कोशिश की गई जहां घनी मुसलमान आबादी थी. भड़काऊ नारे लगाए गए और बड़ी संख्या में लोग तलवार लेकर सड़कों पर उतरे. चुन-चुन कर मुसलमानों की दुकानें जलाई गईं.

भागलपुर दंगा: केंद्रीय मंत्री के बेटे पर एफ़आईआर
ग्राउंड रिपोर्ट: 27 मार्च को बिहार के रोसड़ा में कैसे भड़की थी हिंसा?
इसी तरह, नवादा में मूर्ति तोड़ने और पोस्टर फाड़ने के आरोपों के साथ तनाव शुरू हुआ. वहीं, रोसड़ा में स्थानीय जामा मस्जिद पर हमला हुआ और मस्जिद पर भगवा झंडा फहरा दिया गया. आरोप है कि चैती दुर्गा विसर्जन के समय मूर्ति पर एक मुसलमान घर से चप्पल फेंकी गई. फिर पथराव, तोड़फोड़ और आगज़नी हुई.

भागलपुर में 'हिंदू नववर्ष' को लेकर रैली निकली, हिंदू नववर्ष पर रैली निकालने का चलन बिल्कुल नया है. इस रैली में नफ़रत फैलाने वाले नारे लगे, नारेबाज़ी हुई और तलवार लेकर जयघोष हुआ. पत्थरबाज़ी हुई, दुकानों को लूटा गया और कई दुकानों में आग लगा दी गई.

इन सभी इलाक़ों में बीजेपी, विहिप और बजरंग दल से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं पर गंभीर आरोप लगे हैं. औरंगाबाद में बीजेपी नेता अनिल सिंह जेल गए और रिहा हुए तो ज़िला उपाध्यक्ष बना दिए गए. नवादा में तो सांसद और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह पर ही लोगों को भड़काने के आरोप हैं, हालांकि वो इन आरोपों से इनकार करते हैं.