दिवाली पर पटाखों से होने वाले वायु और ध्वनि प्रदूषण को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 23 अक्टूबर को एक याचिका पर सुनवाई करते हुए देश में सिर्फ रात 8 से 10 बजे के बीच ही पटाखे फोड़ने की समयसीमा तय कर दी। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने यह भी आदेश दिया कि अब से देश में सिर्फ ग्रीन पटाखे ही बनाए और बेचे जाएंगे।
ग्रीन पटाखों का गणित समझने की कोशिश में भास्कर को मिले असम के गोपजीत पाठक। जिन्होंने बताया कि वहां के गानाकच्ची गांव में 130 सालों से ऐसे पटाखे बनाए जा रहे हैं, जो सामान्य पटाखों की तुलना में कम धुआं छोड़ते हैं। यहां पर स्थित बारपेटा फैक्ट्री का काम संभाल रहे गोपजीत पाठक ने बताया, ‘‘बाजार में जो पटाखे बिकते हैं, उनमें बेरियम नाइट्रेट और एल्युमीनियम पाउडर का ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है, जिस कारण इनसे ज्यादा धुआं निकलता है और यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इन पर बैन लगाने की बात कही है। वहीं हमारे यहां 130 साल पुराने चीनी तरीके से जो पटाखे बनते हैं, उनमें ज्यादा केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसी वजह से पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम धुआं निकलता है।’’
तोहफे में मिली किताब से मिला था पटाखे बनाने का चीनी सूत्र
पुस्तक से इस पटाखा कंपनी की कहानी शुरू हुई। मेरे दादा का लक्ष्मी नुबी नाम का दोस्त था। लक्ष्मी बांग्लादेश गए थे, बिजनेस के सिलसिले में। वहां से उन्होंने एक पुस्तक खरीदी और मेरे दादाजी को गिफ्ट की। उसमें चीन के पटाखों का फॉर्मूला था। जिसे पढ़कर बांग्लादेश से सामान मंगाया और पटाखा बनाने की फैक्ट्री शुरू की। असम के बरकटा जिले में एक मंदिर था 'नामघर', वहां पर होली का त्योहार बहुत धूमधाम से मनाते हैं। ये सन 1885 के पहले की बात है, उस समय मेरे दादाजी ने लोगों को पटाखे जलाकर दिखाए। इसके बाद ही लोगों ने पटाखे खरीदना शुरू किया और तभी से हमारा कारोबार शुरू हुआ। मेरे दादाजी के गुजरने के बाद पिता ने और फिर मैंने इसका काम संभाला। अभी इस फैक्ट्री को चौथी पीढ़ी संभाल रही है।
जैसा गोपजीत पाठक ने भास्कर को बताया
ग्रीन पटाखे बनाने का तरीका
गोपजीत पाठक ने बताया कि गानाकच्ची गांव में ज्यादा बड़े पटाखे नहीं बनाए जाते। यहां सिर्फ आसमान बुल्ला (एक तरह का रॉकेट), फुलझड़ी और अनार जैसे पटाखे ही बनते हैं। इन्हें बनाने के लिए सल्फेटरी, सल्फर, चारकोल, एल्युमीनियम डास्क और कास्टीरॉन का इस्तेमाल किया जाता है। ये पारंपरिक पटाखों की ही तरह होते हैं। इन्हें बनाने में थोड़ा ज्यादा खर्चा आता है। लेकिन अच्छी बात ये है कि इनसे वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण दोनों ही कम होता है।
इन्हें जलाने से छोटे-छोटे कणों का उत्सर्जन 30-40% तक और सल्फर डायऑक्साइड का उत्सर्जन 50-60% तक कम होता है। पारंपरिक पटाखों की तुलना में ये 25-30% तक कीफायती भी होते हैं।
क्यों ईको फ्रेंडली हैं ग्रीन पटाखे : ऐसे पटाखे 'सेफ वॉटर एंड एयर स्प्रिंकल्स (एसडब्ल्यूएएस) के सिद्धांत पर काम करते हैं। इनमें जैसे ही एल्युमीनियन पानी को अवशोषित करता है, गर्मी पैदा होती है और इसी वजह से पटाखा फटता है और आवाज होती है। यही पानी धूल के कण को फैलने से रोकते हैं। ग्रीन पटाखे जलने के बाद पानी के कण पैदा करते हैं, जिसमें सल्फर और नाइट्रोजन के कण घुल जाते हैं।
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